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Wednesday, August 26, 2009

गोपाल दास नीरज/प्यार सिखाना व्यर्थ है

अब मुझको प्यार सिखाना व्यर्थ है।

जब बहार के दिन थे बोली न कोयलिया,

जब वृन्दावन तड़प रहा था आया तब न सांवलिया,

बिलख बिलख मर गयी मगर जब विकल बिरह की राधा,

नयन यमुन तट प्राण; मिलन का रास रचना व्यर्थ है।

अब मुझको......

एक बूँद के लिए पपीहे ने सौ सिन्धु बहाए,

किन्तु बादलों ने जी भर कर पहन बरसाए,

तरस-तरस बन गयी मगर जब तृप्ति तृषा ही तो फिर,

पथराये अधरों पर अमृत भी बरसना व्यर्थ है।

अब मुझको.........

अब सब सपने धुल मर चुकी हैं सारी आशाएं,

टूटे सब विश्वास और बदली सब परिभाषाएं,

जीता हूँ इसलिए की जीना भी है एक विवशता,

मरने के भी लिए जिन्दगी की है आवश्यकता,

इसलिए प्रिय प्राण!किसी की सुधि का दीप सलोना,

मेरे अंधियारे खंडहर में आज जलना व्यर्थ है।

अब मुझको प्यार........

Sunday, March 22, 2009

कफ़न में जेब नहीं होती

मेरे परम पूज्य गुरुदेव (डायट अजीतमल औरैया )द्बारा लिखित।
कमा ले दौलत मनचाही, जुटा ले हीरे और मोती.
ध्यान मगर इतना रखना, कफ़न में जेब नहीं होती .
कोठी और बंगले बनवा ले, हवादार जंगल लगवा ले,
भाति भाति के द्वार सजा ले, मन चाहे रंग से रंगवा ले.
देख धनवान घर आँगन, ख़ुशी मन में बहुत होती.
ध्यान मगर इतना रखना, कफ़न में जेब नहीं होती .
रेशम सूती खद्दर पहने, चाहे सब सोने के गहने,
तेरे सगे भाई और बहने, ले उतार, कुछ ना दे रहने.
सिला लो मन चाहे जैसा, कीमती कुर्ता और धोती.
ध्यान मगर इतना रखना, कफ़न में जेब नहीं होती .
एक दिन होए जो सबका होता,
उड़ जाए पिंजडे से तोता,
बेटा-बेटी नाती पोता,
भाई बंधू सबको दुःख होता.
नारी तेरी प्रारण से प्यारी ,
शीश निज पटक पटक रोती.
ध्यान मगर इतना रखना, कफ़न में जेब नहीं होती